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Friday, June 26, 2015

दीखते मोदीजी, बोलते मोदीजी

अपने नरेन्द्र मोदीजी भारत के पहले यत्र तत्र सर्वत्र प्रधानमंत्री हैं। अभी तक सरकार में सब कुछ राष्ट्रपति के नाम में होता है। वह भी केवल सरकारी आदेशों में। वह अब भी होता है।
पर अपने मोदीजी न केवल विभिन्न क्षेत्रों में छपे हुए होते हैं, वे दिखलाई भी देते हैं। पिछले हफ्ते का योग दिवस इसका एक बेहतरीन उदाहरण है।
पूरे दिन मोदीजी टी वी पर छाए रहे। क्योंकि कार्यक्रम मोदीजी का था इसलिए राष्ट्रपति और उप- राष्ट्रपति को न्यौता नहीं। लग रहा था कि मोदीजी नहीं होते तो योग का क्या होता ?
मोदीजी ने स्वंय कुछ सरल पोज दे, रशियो के पुतिनजी को बता दिया कि वे केवल योग का प्रचार नहीं करते, स्वंय योग भी करते हैं। आजकल मोदीजी प्रेरणास्वरूप बनते जा रहे हैं। सभी जगह यही छवि छा रही है उनकी।
सुप्रीम कोर्ट के सरकारी विज्ञापन में केवल प्रधानमंत्री की फोटो वाले फैसले के बाद तो अपने मोदीजी को विज्ञापनों में खुला मैदान मिल गया है। अब कोई मंत्री, मुख्यमंत्री को फोटो नहीं।
मोदी हितेच्छु काफी सृजनशील हैं। आज तक प्रेस इंर्फोमेशन ब्यूरो की वेबसाइट पर केवल समाचार के शीर्षक वाला होमपेज होता था। मोदीजी के आने के बाद इस वेबसाइट पर मोदीजी की फोटो मुख्य होती है, समाचार बाद में दिखते हैं।
अभी कुछ दिन पहले बीएसएनएल से एक एसएमएस मिला। उसका सार था कि प्रधानमंत्री की प्रेरणा से बीएसएनएल 15 जून से भारत में फ्री रोमिंग शूरू करने जा रहा है।
आज सुबह एक फोन आया। उस पर प्रधानमंत्री वाला संदेश रिकार्डड मैसेज के रूप में सुनाई दिया।
मान गये जिय किसी अधिकारी ने यह आइडिया लगाया है उसकी सोच को दाद देनी पड़ेगी। उसने मोदीजी के प्रशंसाप्रिय दिमाग का सही अध्ययन किया है।
काश अधिकारी बीएसएनएल के कामकाज को सुधारने में यह दिमाग लगाते तो लोगों का कितना भला होता। पर उससे जरूरी नहीं कि मोदीजी खुश होते।
देखा मोदीजी यत्र तत्र सर्वत्र । दीखते मोदीजी, बोलते मोदीजी।
   



Thursday, June 25, 2015

जवाहर कर्नावट का अक्षय्यम

आज ही अक्षय्यम का नया अंक आया। यह बैंक ऑफ बड़ौदा का त्रैमासिक है। हालांकि ऑफिस में इस प्रकार की कई मैगज़ीन आती हैं, पर मुझे यह काफी प्रिय है। इसके लेखों में बोलचाल की भाषा और विषय की गहराई का अनोखा समतोल है। शायद इसी कारण इसे पढ़्ने में आनंद आता है।
जवाहर कर्नावट
इसके साथ हे हमारी इसके सम्पादक और हमारे पुराने परिचित जवाहर कर्नावट की यादें ताजा हो जाती हैं जब वे अहमदाबाद में थे। जवाहर कर्नावट उन चुने हुए हिन्दी अधिकारियों में हैं जिनमे भाषा की पकड़ के साथ एक पत्रकार की समचार सूंघो नाक भी है। यह अक्षय्यम के हर लेख में बखूबी झलकता है।
अक्षय्यम की हिन्दी मुझे इसलिये पसन्द है क्योंकि इसमे सरकारी क्लिष्ट हिन्दी का कोई दिखावा नही है। पिछले एक अंक में जिस तरह बैंक के कार्यपालक निदेशक रंजन धवन का परिचय दिया गया था वह किसी भी ऑफिस मैगज़ीन में देखने को नहीं मिलता। जवाहर कर्नावट जैसा सम्पादक ही इस प्रकार के  वर्णन को लिख और प्रकाशित कर सकता है।
कार्यपालक निदेशक रंजन धवन के बारे लिखा है “ बैंक में आपकी छवि एक जिंदादिल, चुस्त दुरुस्त, हरफनमौला व्यक्तित्व की है”।छू जाने वाली बोल्चाल की भाषा। हालांकि हर अंक एकाद महिने लेट निकलता है, इसकी भाषा और विषय चयन में कोई चूक नही होती।
जवाहर कर्नावट के लिए यह जरूर एक बड़ी खुशी की बात होगी कि रिजर्व बैंक ने उनके अक्षय्यम को इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ बैंक मैगज़ीन का अवार्ड दिया। इसी माह जून महिने में यह अवार्ड दिया गया।
जवाहर कर्नावट पिछले दो वर्षों में इस मैगज़ीन में काफी बदलाव लाये हैं। भारतीय भाषाओं के बारे में , बाहर के लेख और किसी सेलीब्रिटी का इंटरवयू। इस प्रकार के मसाले से इस मैगज़ीन ने हमारे जैसे पाठकों के दिल और दिमाग में एक जगह बना ली है। इस सब के बावजूद अगर मुझे सबसे प्रिय कोई कॉलम लगता है तो वह है- आइये सीखिए भारतिय भाषाएं। इसमे एक ही बोलचाल के वाक्य को हिन्दी सहित आठ भाषाओं में लिखा जाता है। हर बार नया विषय और उससे जुड़े 15 वाक्य।एक बार रेलगाड़ी से जुड़े 15 वाक्य थे तो इस बार हवाई जहाज से सम्बन्धित। और ये सभी वाक्य देवनागरी लिपि में लिखे होते हैं।
जैसे कि तेलगु में मैने मथुरा में गाड़ी बदली थी हो जायेगा नेनु मक्षरालो बंडिनी मारानु और कन्नड़ में नानु माथुरादल्लि रलु बदलायिसिदे!
जवाहर कर्नावट को शुरू से ही पत्रकारिता का शौक रहा है।उस जमाने में हिन्दी स्टैनोग्राफी में माहिर हो और पत्रकारिता का शौक होने के कारण वे नई दुनिया आदि अखबारों के लिये फ्रीलांसिंग करते थे। बैंक में स्टेनो की नौकरी मिलने के बाद भी उनका यह शौक बरकार रहा एक नये अंदाज में। उन्होने हिन्दी पत्रकारिता पर पी एच डी कर डाली उनका शोधग्रंथ जल्द ही एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने वाला है।
उनकी एक पुस्तक भी जल्द ही प्रकाशित होने वाली है। यह है विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता के सौ साल। इसके लिए वे कई देशों मे भी गए हैं।

अक्षय्यम के ताजा अंक में विदेशों मे हिन्दी दिवस के आयोजन की रिपोर्ट है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने इस बार पहली बार विदेशों मे हिन्दी दिवस मनाया था। पूरे  25 देशों में।

Tuesday, June 23, 2015

ब्रिटिश लाइब्रेरी

दत्तात्रेय कुलकर्णी
इस रविवार को लाइब्रेरी के आनलाईन रिसोर्सिस के उपयोग पर एक घंटे के कार्यक्रम में भाग लिया। काफी उपयोगी था।
इस लाइब्रेरी के साथ शुरू से ही सम्बन्ध है।35 साल हो गए हैं। अहमदाबाद में शुरू हुई तब से. उस जमाने से जब कर्णिक इसके लाइब्रेरियन हुआ करते थे और आज लाइब्रेरियन के नए स्वरूप मैनेजर के पद पर दत्तात्रेय कुलकर्णी हैं।

जिस प्रकार से कुलकर्णीजी ने विभिन्न संसाधनों के बारे में जानकारी दी और हमारे जैसे पाठकों के छोटे-छोटे कभी कभार फालतू विषय वाले, सवालों के जवाब दिए उससे उनका विषय ज्ञान ही नहीं पर मेम्बर प्रेम भी झलकता है।
लाइब्रेरी की यही खूबी है कि जो आज तक हमें इससे जोड़े हुए हैं। पिछले महिने लायब्रेरी से हुता रावल का फोन आया। योगेशभाई आपने कलकत्ता लायब्रेरी में जिस पुस्तक को रिजर्व करवाया है वह अहमदाबाद में भी उपलब्ध है। क्या आपके लिए अहमदाबाद में इसे रिजर्व कर दूं।
आप भी किसी लाइब्रेरी के सदस्य होंगे। क्या आपने लाइब्रेरी को पाठक के लिए इतना संवेदनशील पाया है? जवाब ना में ही होगा। मेरा खुद का अनुभव यह कहता है. और इस लाइब्रेरी के स्टाफ का यह व्यवहार मुझ पत्रकार तक ही सीमित नहीं है।
मैं गुजरात विद्यापीठ लाइब्रेरी का 1969 से आजीवन सदस्य हूं और लगभग 1980 से एमजे लाइब्रेरी से जुड़ा हुआ हूं। ये दोनों राज्य की सबसे बड़ी लाइब्रेरी हैं। इससे पहले म्यु. कार्पोरेशन के बालभवन में बच्चों की किताबें पढ़ने जाता था।
पर आजकल मेरी प्रिय लाइब्रेरी ब्रिटिश लाइब्रेरी है जिसका मैं महत्तम उपयोग करता हूं। न तो मैं अंग्रेजों का तरफदार हूं, न ही अंग्रेजी का। ब्रिटिश लाइब्रेरी की कई विशेषताएं हैं जिन्होंने इसे मेरे जैसे पाठकों का प्रिय स्थल बना दिया है।
मेरे जीवन में इस लाइब्रेरी से जुड़ी कई ऐसी घटनाएं हैं जो एक लम्बे रोचक लेख का मसाला बन सकती हैं। फिलहाल तो लाइब्रेरी की खासियतों की ही बात करूंगा।
सर्वप्रथम तो यह कि यहां पुस्तकें इस प्रकार से रखी हुई हैं कि कोई भी आसानी से पुस्तक ढूंढ सकता है पास के स्टूल या कुर्सी-टेबल पर बैठ पढ़ सकता है।
इससे विशेष यह है कि अच्छी विदेशी किताबें तो मिलती ही हैं साथ ही लेटेस्ट भी। 2015 में आप 2015 की ताजा किताब पढ़ सकते हैं।
इन सबसे खास यह कि यदि आपको कुछ अच्छा लगे तो जेरोक्स भी करवा सकते हैं! !उतारने की माथापच्ची ही नहीं।
मेरे लिए सबसे बड़ा आकर्षण है इसकि विदड्रोन (पुस्तकालय से बाहर नकाली गई पुस्तके) बुक्स की सेल। हर वर्ष मार्च में कुछ हजार पुरानी पुस्तकें सदस्यों को सस्ते दाम पर बेची जाती है। मेरी लाइब्रेरी में इस प्रकार की दर्जनों पुस्तकें हैं। हर वर्ष मैं काफी पुस्तकें इस सेल में खरीदता हूं।
अगला बड़ा लेख मैं लाइब्रेरी में बैठ कॉफी के साथ लिखूंगा सभी मेम्बरों में एक अन्य चीज जो प्रिय हैं वह है कॉफी। आप लाइब्रेरी में कॉफी के साथ लिख पढ़ सकते हैं, क्या किसी लाइब्रेरी में कॉफी के साथ किताब पढ़ने का लुत्फ उठा सकते हैं?
लिखने को तो और बहुत कुछ है। खैर फिर कभी।

Sunday, June 21, 2015

महिला डॉक्टर -पहले महिला बाद में डॉक्टर

शीर्षक पढ़ आप कहेंगे कि यह तो सभी को मालूम है। आप क्या तोप मार रहे हैं यह कह कर। सही बात है। पर, हमारा मुद्दा है कि महिला डॉक्टरों का महिला केन्द्रित कार्यक्रम।
शहर में रविवार, योग दिवस, को महिला डॉक्टरों ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। यह महिला डॉक्टरों के लिए था । अन्य महिलाएं भी आमंत्रित थीं, अहमदाबाद मेडिकल ऐसिसयेशन की महिला शाखा के इस कार्यक्रम में।
महिला महिला ही है। व्यावसायिक जिम्मेदारियों के साथ परिवार की देख रेख का भार भी उठाती हैं। भले ही खुद डॉक्टर हो, किसी भी सामान्य महिला की तरह खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह।
भले ही खुद कितना भी कमाती हो, कमाई और कर आयोजन के लिए पिता या पति या भाई पर आधार रखती हैं या महिला डॉक्टर।
ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिन्होंने इस शाखा की अध्यक्षा डॉ. मोना देसाई को इस कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि इसमें ऐसे विषय चुने ,जो हर महिला डाक्टर को किसी रूप से छूते हैं।
मोटापन, कास्मेटिक सर्जरी किस महिला को स्पर्श नहीं करती। भले वे स्वयं डाक्टर हों, जरूरी नहीं कि वे इन वषयों को गहराई से जानती हों । इसलिए, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैन्सर के साथ साथ इन दो विषयों पर भी विषय एक्सपर्ट इन महिला डाक्टरों के लिए थे
आज टैक्नोलॉजी के जमाने में जहां नए नए गैजेट किसी के लिए भी चैलैन्ज हैं वहीं साईबर क्राइम किसी को भी लपेट में लेते ऐसा नया अपराध उभर रहा हो। तो हमारी मोनाजी ने महिला डॉक्टरों के लिए इसे भी चुन लिया ।
अद्यतन टैक्नोलॉजी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से लैस होने के बावजूद महिला डॉक्टर है तो हिन्दुस्तानी ही और वह हिन्दुस्तानी ही बनी रहे तो मोनाजी के इस एक दिवसीय सेमीनार में आधुनीकरण विदाऊट वेस्टर्नाइजेशन पर भी एक लेक्चर था
उनका कहन है कि रूढ़ीवादी महिला अब प्रगतिवादी हो गई है। इस सफर में महिला ने कुछ पाया है तो कुछ खोया भी है। इसकी बैलैंस शीट पर भी चर्चा रखी गई थी
वास्तव में जिस तरह से विषय चुने गए और वक्ता का चयन हुआ वह पूरे कार्यक्रम की सर्जनात्मक शक्ति को अभिव्यक्त करता है। स्वाभाविक है इसकी मौलिकता ने 600 से अधिक डेलीगेट्स को आकर्षित किया और रजिस्ट्रेशन बंद करना पड़ा।

महिला किसी भी क्षेत्र में कितनी भी आगे पहुंच गई हो, आखिरकार वो महिला ही रहती है। उसकी समस्याएं उसकी ही रहती हैं।

Saturday, June 20, 2015

मोदी योग दिवस

पिछले कुछ दिनों से अखबारों में जिस प्रकार योग के अधपके ज्ञान से भरपूर लेख और समाचार पढ़ने को मिल रहे हैं उसमें लगता है कि मोदीजी प्रेरित योग दिवस से पहले योग शायद पाताल की गहराई में खो गया था।
अपने पत्रकार मित्र तथाकथित सेलीब्रिटीज के इन्टरव्यू छाप रहे हैं कि कैसे वे वर्षों से योगा कर रहे हैं। लगता है कि योग यानि कि आसन। आदि यह सच है तो पतंजलि योग के बाकी सात अंग यम, नियम आदि का क्या?
इसमें कोई शक नहीं कि टीवी युग में योग गुरु बनने की होड़ में बाबा रामदेव ने अच्छे अच्छों को पछाड़ दिया है। अब लगता है कि मोदीजी आगे निकल रहे हैं। जिस तरह से विज्ञापन और प्रचार मसाला परोसा जा रहा है उससे तो यही लगता है।
1960 के दशक से महेश योगी, बीके अयंगर एवं अन्य ने विश्व में योग की ज्योत जलाई उसके लिए किसी संयुक्त राष्ट्र की छाप नहीं थी।
योग पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा चुक है। पर आज यह बतलाया जा रहा है कि मोदीजी की प्रेरणा से विश्व के 177 देशों ने विश्व योग दिन की मंजूरी दी जिससे योग की वैश्विक पहचान बनी. तो अभी तक जो हुआ वह क्या था?
अपनी मुख्यमंत्री आनन्दी बेन पटेल की सरकार के विज्ञापनों का क्या कहना? ध्रुव तारे की तरह स्थिर है मोदीजी का स्थान गुजरात सरकार के विज्ञापनों में। इस बार भी मोदीजी ही केन्द्र में हैं। हां सुप्रीम कोर्ट के के कारण आनन्दीबेन का फोटो नहीं है।
पर सूचना विभाग ने इसका भी तरीका ढूंढ निकाला। आनन्दीबहन का ध्यान मुद्रा का फोटो जारी हुआ। हर दृष्टि से इस फोटो की न्यूज वैल्यू थी। गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री योगमय होती हुई!! कुछ भी असम्भव नहीं यदि कोई कुछ करने की ठान ले। कई अखबारों में यह फोटो छपी भी।
विज्ञापन का कहना है कि विश्व योग दिन के मोदीजी के प्रस्ताव को यूएन ने मंजूरी दी उससे यूएन ने उनके अडिग व्यक्तित्व पर उसकी मोहर लगा दी।
शुक्र है कि विज्ञापन ने मोदीजी की छप्पन इंच की छाती की बात नहीं की। वैसे जब भारतीय सेना ने बर्मा में आतंकियों पर कार्रवाई की थी तब कुछ अखबारों ने कहा था कि मोदीजी ने उनकी छप्पन इंच की छाती बता दी है।
मोदीजी के ध्यान के फोटो तो पिछले एक वर्ष में कई बार छप चुके हैं। ध्यान मुद्रा ही क्यों, कोई अन्य आसन क्यों नहीं जो उनके शरीर के लचीलेपन और स्फूर्ति को बताए।
मोदीजी भले ही योग के कितने ही प्रेमी हों, हैं तो वे नेता ही। कुछ ने सूर्यनमस्कार और ओंकार का विरोध किया तो ये दोनों ही योग दिवस कार्यक्रम से बाहर! यह कोई नेता ही कर सकता है। किसी वस्तु की जान निकल कर भी कहे कि लो ये तुम्हारे लिए हैं।

तो ये योग दिवस है या मोदी योग दिवस।

Friday, June 19, 2015

पप्पू का जन्मदिन

आज राहुल बाबा का जन्मदिन था। हमें मालूम नहीं था, लोगों को भी मालूम नहीं था। पर जिस तरह से कांग्रेस ने राहुलजीका जन्मदिन मनाया पूरे देश को मालूम पड़ गया कि राहुल बाबा का जन्मदिन है।
पूरे 45 साल के हो गए हैं अपने राहुलजी। पर पार्टी के नेता यह स्वीकार कर रहे हैं कि पहली बार राहुलजी का जन्मदिन मना रहे हैं।
ऐसा क्या हो गया कि राहुलजी का जन्मदिन मनाया जा रहा है। ये वही राहुल है, कांग्रेस के उपाध्यक्ष। अध्यक्ष बनने की बात महिनों से चल रही है। वो अध्यक्ष बने तब ठीक। आज तो वो उपाध्यक्ष ही हैं।
उनका जन्मदिन कोई छोटी बात नहीं है। अपने विश्वाटन वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने देशाटन कर रहे राहुलजी को फोन कर जन्मदिन की बधाई दी। उनका यह जन्मदिन पिछले वर्ष भी था। जहां तक हमारी जानकारी है मोदीजी उस समय राहुलज को मोदीजी के लोगों के  प्रिय पप्पूके रूप में जानते थे। पप्पू को जन्मदिन की क्या बधाई?
वैसे भी लोगों का कहना है कि पिछले दस वर्ष अपने राहुल भैय्या ने उनका जन्मदिन विदेश में ही मनाया है। साफ है कि केवल उनके मित्र ही उनका जन्मदिन मनाते थे। आज देश मना रहा है!
आजकल हमारे राहुलजी देशाटन में लगे हुए हैं। गांव बांव की धूल चख रहे हैं। साफ है जन्मदिन भी भारत में मना रहे हैं। अभी तक हमें यह मालूम नहीं पड़ा कि वे देशी लड्डू खाकर जन्मदिन मना रहे हैं या विदेशी केक काट कर।
हां कांग्रेस वाले जोर जोर से उनका तरह तरह के कार्यक्रमों से जन्मदिन मना रहे हैं। गुजरात कांग्रेस ने लेपटोप वाले राहुलजी के आईटी क्रांति वाले पिता राजीवजी को याद कर ई-वोटिंग जागृति अभियान किया। पार्टी नेताओं को इस क्षेत्र में राहुलजी का कोई ठोस योगदान नहीं मिला तो प्रेजेन्टेशन राजीवजी से शुरू किया।
पुडुचेरी में किसी ने प्रर्थन की तो किसी ने लोगों को भोजन कराया। दिल्ली में कांग्रेसी नेता ढोल नगारे बजते हुए देखे गए।
हमारे एक विद्वान मित्र ने हमारी सोच को एक नई दृष्टि दी। साथ ही एक प्रश्न भी। उन्होंने कहा कि राहुलजी का जन्मदिन इसलिए मनाया गया क्योंकि वे पिछले कुछ महिनों में राहुल बाबा उर्फ पप्पू से राहुल गांधी बन गए हैं। विपसन्ना ध्यान के बाद के पप्पू के नए अवतार धारदार नेता राहुल गांधी के जन्मदिन का उत्सव


सवाल यह है कि राहुल कि उम्र कितनी 45 साल या 4.5 महिने ! !

Thursday, June 18, 2015

मोदीजी की योगा एक्सप्रेस

मोदीजी ने प्रधानमंत्री बनने के कुछ महिनों में ही वैश्विक स्तर पर योग का लोहा मनवा लिया और इस रविवार 21 जून को वो पूरी दुनिया से योगासन करवा रहे हैं।
योगासन कार्यक्रमों और योगा के प्रचार प्रसार के लिए लोगों, संस्थाओं और सरकारी मंत्रालयों में गला काट स्पर्धा लगी हुई है। आए दिन किसी नए कार्यक्रम की घोषणा अखबारों में जगह बनाने के लिए अन्य समाचारों को हिलाती हुई दिखलाई देती है।
अपना रेल मंत्रालय कैसे पीछे रहता। घोषणा कर दी कि अब, तत्काल प्रभाव से अहमदाबाद-हरिद्वार के बीच चलने वाला हरिद्वार मेल योगा एक्सप्रेस कहलाएगा। देखा जाए तो यह पुराने दिल्ली मेल का तीसरा अवतार है।
यह गाड़ी शुरु हुई थी अहमदाबाद-दिल्ली के बीच दिल्ली मेल के नाम से बाद में गाड़ी बढ़ी हरिद्वार तक और नाम हो गया हरिद्वार मेल। पर तीसरे अवतार योगा एक्सप्रेस की तुक हमें समझ नहीं आई।
अरे भई अगर हम योगा के मूल भारतीय नाम योग के संदर्भ में देखें तो हर गाड़ी व्यक्तियों और शहरों को जोड़ती है। देखा शब्दों का कमाल!!
और अगर योगा’ की बात करें तो अज हमारी गाडियों की जो हालत है वह आम आदमी को डब्बे में घुसाने और उसमें जगह बनाने के लिए तरह तरह के आसन करने के लिए मजबूर कर देती है। हमारे रेलमंत्री का कहना है कि इस नामकरण से योगा का प्रचार होगा।
यह कोई जयपुर-बान्द्रा के डब्बों पर लगा वंडर सीमेंट का विज्ञापन थोड़े ही है, जो योग का प्रचार प्रसार करेगा। हरिद्वार-मेल ही क्यों?
हरिद्वार का योग से क्या सम्बन्ध? हां एक बात है कि वहां बाबा रामदेव उनके पतंजलि योग विद्यापीठ के एकड़ों जमीन में फैले प्रागण में अपने पेट को गाड़ी की तरह छुक-छुक चला अच्छों अच्छों के छक्के छुड़ा देते हैं।
योगा एक्सप्रेस की घोषणा सुनते ही हमारे दिमाग में दो दिन पहले की गुजरात के शिक्षा मंत्री भूपेन्द्रसिंह की बात याद आई। जब उनसे एक पत्रकार ने पूछा कि योगा डे का प्रचार हो रहा है पर पतंजलि का क्या? वे तपाक से बोले थे मैंने पतंजलि योगविद्यापीठ का जिक्र किया है। (यह हमारे भूपेन्द्रसिंह आसन वाले जीरो कॉलम में हैं)
आज इन्स्टेन्ट फूड की इस पीढ़ी के लिए तो योग यानि कि रामदेव और पतंजलि यानि पतंजलि योग विद्यापीठ (ऋषि पतंजलि नहीं)। रेल मंत्री को भी मालूम है कि मोदीजी के दोनों हाथ बाबा रामदेव पर है और दिल्ली में रहकर भी मोदीजी के लिए गुजरात ही सब कुछ है, भले वे विश्वाटन करते हों।
अब हरिद्वार में मोदीजी के गुजरात और मोदीजी के रामदेव को जोड़ता है तो मंत्रीजी ने एक गाड़ी से मोदी और रामदेव दोनों को खुश रखने के लिए दिल्ली मेल का तीसरा अवतार योगा एक्सप्रेस रेल लाईन पर चला दिया। रेल मंत्रालय में आसनस्थ रहना है या नहीं!!
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