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Saturday, January 9, 2016

घर के दरवाजे पर शहनवाज हुसैन

32 वर्षीय छात्र नेता शहनवाज हुसैन अब अहमदाबाद के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र जमालपुर के पार्षद हैं। यह उनका पहला नगर निगम चुनाव था और वे जीत कर पार्षद बन गए।
एक मंझे राजनेता की तरह बतियाते शाहनवाज ने अपने कार्यकाल के पहले महिने में ही मतदाताओं से मिलने का कार्यक्रम एक अभियान के रूप में शुरू किया है। उन्होंने इसका नाम दिया है कॉर्पोरेटर एट योर होम – आपके घर पर आपका पार्षद।
एक महिने में पूरे क्षेत्र के दो राउन्ड लाग चुके हैं शहनवाज भैय्या। हर शनि-रवि को यही काम। सोम-मंगल को अधिकारियों के साथ लोगों की समस्या के मुद्दे। और बाद में उसका फालोअप।
उनका कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें एक बात सबसे अधिक सुनने को मिली। चुने जाने के बाद कार्पोरेटर पांच साल में एक बार ही दिखते हैं।
इसे केन्द्र में रखते हुए मैंने निर्णय किया कि मैं अधिक से अधिक मतदाताओं के सम्पर्क में रहूंगा और उनकी समस्याओं को हल करूंगा, शहनवाज कहते हैं। हालिंक उनके क्षेत्र में 80 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम है, फिर भी उनका मानना है कि पार्षद के रूप में उन्हें सभी की समस्याओं को केन्द्र में रखना चाहिए।
शहनवाज और उनके क्षेत्र के दो अन्य पार्षद जल्द ही उनके वार्ड का 24x7 कार्यालय खोलने जा रहे हैं। उनका कहना है कि रात को एक जिम्मेदार व्यक्ति रहेगा जो मतदाताओं की समस्या सुनेगा और उन्हें मदद करेगा। मेडीकल और पुलिस इन दो प्रकार की समस्याएं ही जरूरी मुद्दे होते हैं रात के समय।
शहनवाज एनएसयूआई के नेता हैं। फिलहाल वे गुजरात युनिवर्सिटी के सेनेट मेम्बर हैं।
2001 से छात्र राजनिति में जुड़े शहनवाज ने विभिन्न राज्यों में एनएसयूआई के प्रभारी के रूप में कार्य किया है। उनके अनुसार यही उनकी राजनीति की शिक्षा का स्थल रहा है। 2007 में यूपी 2008 बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के अनुभव ने उन्हें बहुत कुछ सिखलाया है।
उनका कहना है कि यदि जिन्दगी को जानना है, सही मायने में सीखना है तो हमें घूमना चाहिए। भले ही हम एक सामान्य यात्री के रूप में घूमें। कॉलेज में सतत तीन वर्ष तक वे गाने की प्रतियोगिता जीतते रहे। उनका कहना है कि इससे एक ओर उनका स्टेज का डर निकला तो दूसरी ओर उन्हें पब्लिक लाईफ का चस्का लगा। यही उन्हें एनएसयूआई में लाया और फिर अब अहमदाबाद नगर निगम में।
उनके पिता एक डाक्टर हैं। वे ही उनके प्रेरणा स्त्रोत है। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में रहकर हिन्दुओं के क्षेत्र में चिकित्सा सेवा यह उनके पिता की खासियत है। मेरे पिता के किसी भी समय बिना किसी कटुता के मरीज को देखने के निस्वार्थ भाव से मैंने लोगों के लिए कार्य करना सीखा है, वे कहते हैं।
शहनवाज दो जिम से जुड़े हुए हैं, जो उनकी आय का स्त्रोत हैं।

Monday, August 3, 2015

भारत का पहला धर्म रिपोर्टर डॉ. प्रणव दवे

विषय धर्म और डॉ. का सम्बोधन ये दोनों ही हमें किसी ऐसे व्यक्ति का ध्यान कराते हैं जो उम्र लायक है। पर हमारे धर्म रिपोर्टर डा. प्रणव दवे केवल 33 वर्ष के है और देश के पहले पूर्णकालीन धर्म रिपोर्टर है।
प्रणव दवे फिलहाल टाइम्स ऑफ इन्डिया के गुजराती दैनिक नवगुजरात समय में पूर्णकालीन रिलीजन रिपोर्टर हैं और पिछले 14 वर्षों से वे केवल धर्म के बारे में ही लिखते आ रहे हैं और प्रतिष्ठित अखबारों के धर्म परिशिष्ठ का संकलन कर रहे हैं।
उनका परिचय उनकी विद्वता और उनक लेख उनके कलम की पहचान हैं। उन्होंने संस्कृत और पाली (संस्कृत का वह रूप जिसमें जैन साहित्य लिखा गया है) में गुजरात यूनिवर्सिटी से डबल एमए किया है। भविष्य पुराण में सूर्य पूजा पर शोध ग्रन्थ लिख पीएचडी किया है। अब वे दूसरी पीएचडी कर रहे हैं। विषय है साइबर मीडिया का हिन्दू धर्म पर प्रभाव। डबल एमए के बाद डबल पीएचडी की तैयारी वह भी 33 वर्ष की अल्पायु में ही।
हिन्दी की सहजता से ही संस्कृत में संवाद करने वाले डॉ. प्रणव दवे अपनी इस उपलब्धियों के लिए उनके पिता रोहित दवे को उनका गुरु मानते हैं। रोहित भाई सूचना विभाग से जुड़े थे और गायत्री परिवार से शुरू से ही जुड़े हुए हैं। उनका धर्म और पत्रकारिता का घरेलू वातावरण ही उनका इन दो विषयों में आगे बढ़ने का प्रेरणा मंत्र बना।
प्रणव जितने धर्म में निपुण हैं उतने ही आधुनिक टेक्नोलॉजी में दक्ष। गुजरात के अग्रणी समाचार पत्र गुजरात समाचार के दो वर्ष के कार्यकाल में धर्म रिपोर्टिंग के अलावा प्रणव उस समाचारपत्र के वेब पोर्टल का कामकाज भी सम्भालते थे। यही कारण है कि उनकी दूसरी पीएचडी साइबर मीडिया और धर्म के बीच एक कड़ी है।
उनके यादगार क्षणों में कोई कमी नहीं है। जयेन्द्र सरस्वती जिन्हें जयललिता केस में जेल जाना पड़ा था, उन्होंने अहमदाबाद में किसी को भी इन्टरव्यू देने की ना कह दी थी। केवल प्रणव दवे को ही इन्टरव्यू दिया था। इसका कारण न तो प्रणव दवे का नाम था और न ही उनके अखबार का बैनर। इसका कारण इतन मात्र था कि प्रणव दवे ने अपना परिचय उन्हें संस्कृत में दिया था।
उनका कहना है कि हिन्दू धार्मिक संस्थाएं काफी तेजी से आईटी का उपयोग कर रही हैं और यह उनके प्रचार प्रसार का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने सूर्य मीमांसा नामक पुस्तक भी लिखी है जिसमें गुजरात के सूर्य मंदिरों के विषय में जानकारी है।
उन्हें ज्योतिष में भी काफी विश्वास है। उनका कहना है कि ज्योतिष एक प्रकार का साईन बोर्ड है जो हमें आने वाली घटनाओं से अवगत कराता है।

Monday, July 27, 2015

तुषारभाई का वेडिंग टूरिज्म

आजकल टूरिज्म का जमाना है। तरह तरह का टूरिज्म। अब खेत-खलिहान देखने जाएं, फार्म टूरिज्म। आप बीमार हो या किसी बीमार व्यक्ति को बड़े अस्पताल ले जाए तो मेडीकल टूरिज्म।
आजकल लोग (धनाढ्य व्यक्ति) पर्यटक स्थलों पर जा शादी आयोजित करते हैं। अपने सूरत और नासिक के लोग सापूतारा में शादी करने जाते हैं। कई लोग विदेश में बारात ले जा वहीं शादी करते हैं।
आप इसे क्या कहना चाहेंगे? वेडिंग टूरिज्म। अपने अहमदाबाद के तुषार अजमेरा का तो यही मानना है। वर्षों से शादी की फोटोग्राफी करते हैं। पर उनका मानना है कि शादी दुल्हा दुल्हन और उसके फोटोग्राफ का साधारण इवेन्ट नहीं है। यह एक बदलाव का इवेन्ट है। दो परिवारों में आने वाले बदलाव का सूचक इवेन्ट है।
अपने इसी ख्याल को तुषारभाई लंडन में प्रदर्शन में अगस्त और सितम्बर माह में रखने वाले हैं। उन्होंने एक ही शादी के फोटो का एल्बम बनाया है। यह उनका इस प्रकार का पहला प्रदर्शन है। भारत और भारत के बाहर। इसकी भी बड़ी रोचक कहानी है तुषारभाई की।
एक बार लंडन घूम रहे थे। ख्याल आया कि यहां की शादी में हिन्दुस्तान जैसा मजा कहां है?न जाने कब बरसात टपक पड़े। इस डर से आम आदमी तो हॉल ही में शादी करते हैं। धनाढ्य वर्ग के लोग शादी के लिए स्पेन, टर्की वगैरह जाते हैं, जहां खुले आसमान का आनन्द ले सकें।
वे लंडन के लोगों को बताना चाहते हैं कि भारत में यह सब कुछ है। उनका कहना है कि अगर वहां के लोग विदेश जा सकते हैं तो भारत में भी आ सकते हैं।
इससे उन्हें क्या मिलेगा? उनका जवाब है कुछ नया करने का आनन्द। सही बात है शादी की फोटोग्राफी के कुछ सौ पाउन्ड के लिए तो वे यह नहीं करेंगे।

Saturday, July 25, 2015

मोदीजी की कविताएं हिन्दी में, एक नया परिचय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक जीवन की उथल पुथल में यदि कुछ होता है तो वह है उनके व्यक्तित्व का मानवीय स्वरूप, उनके कवि हृदय की पहचान। यह बात उनकी कविताओं को पढ़ कर बहुत ही स्पष्ट रूप से उभर कर आती है।
हाल ही में कवियत्री डा. अंजना संधीर से मिलना हुआ। कुछ समय पहले मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल ने उनके द्वारा मोदीजी की कविताओं के हिन्दी अनुवाद का विमोचन किया। उच्च कोटि के इस अनुवाद को पढ़ कर लगता है कि मानो मोदीजी ने हिन्दी में ही कविताओं को लिखा है।
थोड़े समय में ही यह पुस्तक लेखकों और कवियों में देश में काफी लोकप्रिय हो गई है। इसका मुख्य कारण है कि इस पुस्तक ने मोदीजी के भीतर के कवि को एक राष्ट्रीय पहचान दी है। हिन्दी पढ़ने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग है। उस वर्ग के माध्यम से देश के कई राज्यों में लोगों को प्रधानमंत्री के कवि हृदय का परिचय हुआ है।
आज अंजना संधीर ने इन कविताओं के उडिया अनुवाद की पुस्तक दिखलाई। यह इस पुस्तकआंखें ये धन्य है” के लगभग 8 भाषाओं में हो रहे अनुवाद में से एक है। हालांकि मोदीजी की कविताओं के संकलन में 67 कविताएं गुजराती में हैं, अनुवाद के लिए आधार बन रही हैं हिन्दी में अनुवादित अंजना संधीर की पुस्तक। किसी भी लेखक के लिए यह एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी पुस्तक कई अन्य पुस्तकों के लिए आधार बने। अंजना संधीर के लिए यह पुस्तक एक ऐसा ही आधार बनी है।
अंजना संधीर अहमदाबाद की है और नरेन्द्र मोदीजी से उनका व्यक्तिगत परिचय है। गुजराती पुस्तक उन्हें मोदीजी की ओर से 2008 में मिली थी। इसका अनुवाद उन्होंने पिछले वर्ष किया। अंजनानी इन कविताओं में एक मानवतावादी, राष्ट्रवादी और संवेदनशील कवि मोदी को देखती है।
उनकी हम तो कविता इसी मानवत्व की आत्माभिव्यक्ति है-
कोई पन्थ नहीं, नहीं सम्प्रदाय,
मानव तो बस है-मानव;
उझाले में क्या फर्क पड़ता है,
दीपक हो या लालटेन........!”
जीवन में प्रेम की उष्मा आवश्यक है। कर्तव्य और त्याग की उष्मा आवश्यक है। प्रेम की उष्मा के बिना मानव उत्कृष्टता की ओर बढ़ ही नहीं सकता।
बिना प्रेम पंगु बन मानव लाचार, पराधीन सा जीता है।
अभाव की एक डोरी ले, पल को पल से जीता है।
तस्वीर के उस पार कविता में भी उनकी ओजस्विता, स्वाभिमान, श्रम-साधना परिलक्षित है।
मैं तो पद्मासन की मुद्रा में बैठा हूं
अपने आत्मविश्वास में
अपनी वाणी और कर्मक्षेत्र में,
तुम मुझे मेरे काम से ही जानो.......
...... मेरी आवाज की गूंज से पहचानो,
मेरी आंख में तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब है।
अन्त में उनकी यह कविता जाना नहीं
यह सूर्य मुझे पसन्द है
अपने सात घोड़ों की लगाम
हाथ में रखता है
लेकिन उससे कभी भी घोड़ों को
चाबुक मारा हो
ऐसा जानने में आया नहीं
इसके बावजूद
सूर्य को मति
सूर्य को गति
सूर्य को दिशा
सब एक दम बरकरार
केवल प्रेम

Friday, June 26, 2015

दीखते मोदीजी, बोलते मोदीजी

अपने नरेन्द्र मोदीजी भारत के पहले यत्र तत्र सर्वत्र प्रधानमंत्री हैं। अभी तक सरकार में सब कुछ राष्ट्रपति के नाम में होता है। वह भी केवल सरकारी आदेशों में। वह अब भी होता है।
पर अपने मोदीजी न केवल विभिन्न क्षेत्रों में छपे हुए होते हैं, वे दिखलाई भी देते हैं। पिछले हफ्ते का योग दिवस इसका एक बेहतरीन उदाहरण है।
पूरे दिन मोदीजी टी वी पर छाए रहे। क्योंकि कार्यक्रम मोदीजी का था इसलिए राष्ट्रपति और उप- राष्ट्रपति को न्यौता नहीं। लग रहा था कि मोदीजी नहीं होते तो योग का क्या होता ?
मोदीजी ने स्वंय कुछ सरल पोज दे, रशियो के पुतिनजी को बता दिया कि वे केवल योग का प्रचार नहीं करते, स्वंय योग भी करते हैं। आजकल मोदीजी प्रेरणास्वरूप बनते जा रहे हैं। सभी जगह यही छवि छा रही है उनकी।
सुप्रीम कोर्ट के सरकारी विज्ञापन में केवल प्रधानमंत्री की फोटो वाले फैसले के बाद तो अपने मोदीजी को विज्ञापनों में खुला मैदान मिल गया है। अब कोई मंत्री, मुख्यमंत्री को फोटो नहीं।
मोदी हितेच्छु काफी सृजनशील हैं। आज तक प्रेस इंर्फोमेशन ब्यूरो की वेबसाइट पर केवल समाचार के शीर्षक वाला होमपेज होता था। मोदीजी के आने के बाद इस वेबसाइट पर मोदीजी की फोटो मुख्य होती है, समाचार बाद में दिखते हैं।
अभी कुछ दिन पहले बीएसएनएल से एक एसएमएस मिला। उसका सार था कि प्रधानमंत्री की प्रेरणा से बीएसएनएल 15 जून से भारत में फ्री रोमिंग शूरू करने जा रहा है।
आज सुबह एक फोन आया। उस पर प्रधानमंत्री वाला संदेश रिकार्डड मैसेज के रूप में सुनाई दिया।
मान गये जिय किसी अधिकारी ने यह आइडिया लगाया है उसकी सोच को दाद देनी पड़ेगी। उसने मोदीजी के प्रशंसाप्रिय दिमाग का सही अध्ययन किया है।
काश अधिकारी बीएसएनएल के कामकाज को सुधारने में यह दिमाग लगाते तो लोगों का कितना भला होता। पर उससे जरूरी नहीं कि मोदीजी खुश होते।
देखा मोदीजी यत्र तत्र सर्वत्र । दीखते मोदीजी, बोलते मोदीजी।
   



Thursday, June 25, 2015

जवाहर कर्नावट का अक्षय्यम

आज ही अक्षय्यम का नया अंक आया। यह बैंक ऑफ बड़ौदा का त्रैमासिक है। हालांकि ऑफिस में इस प्रकार की कई मैगज़ीन आती हैं, पर मुझे यह काफी प्रिय है। इसके लेखों में बोलचाल की भाषा और विषय की गहराई का अनोखा समतोल है। शायद इसी कारण इसे पढ़्ने में आनंद आता है।
जवाहर कर्नावट
इसके साथ हे हमारी इसके सम्पादक और हमारे पुराने परिचित जवाहर कर्नावट की यादें ताजा हो जाती हैं जब वे अहमदाबाद में थे। जवाहर कर्नावट उन चुने हुए हिन्दी अधिकारियों में हैं जिनमे भाषा की पकड़ के साथ एक पत्रकार की समचार सूंघो नाक भी है। यह अक्षय्यम के हर लेख में बखूबी झलकता है।
अक्षय्यम की हिन्दी मुझे इसलिये पसन्द है क्योंकि इसमे सरकारी क्लिष्ट हिन्दी का कोई दिखावा नही है। पिछले एक अंक में जिस तरह बैंक के कार्यपालक निदेशक रंजन धवन का परिचय दिया गया था वह किसी भी ऑफिस मैगज़ीन में देखने को नहीं मिलता। जवाहर कर्नावट जैसा सम्पादक ही इस प्रकार के  वर्णन को लिख और प्रकाशित कर सकता है।
कार्यपालक निदेशक रंजन धवन के बारे लिखा है “ बैंक में आपकी छवि एक जिंदादिल, चुस्त दुरुस्त, हरफनमौला व्यक्तित्व की है”।छू जाने वाली बोल्चाल की भाषा। हालांकि हर अंक एकाद महिने लेट निकलता है, इसकी भाषा और विषय चयन में कोई चूक नही होती।
जवाहर कर्नावट के लिए यह जरूर एक बड़ी खुशी की बात होगी कि रिजर्व बैंक ने उनके अक्षय्यम को इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ बैंक मैगज़ीन का अवार्ड दिया। इसी माह जून महिने में यह अवार्ड दिया गया।
जवाहर कर्नावट पिछले दो वर्षों में इस मैगज़ीन में काफी बदलाव लाये हैं। भारतीय भाषाओं के बारे में , बाहर के लेख और किसी सेलीब्रिटी का इंटरवयू। इस प्रकार के मसाले से इस मैगज़ीन ने हमारे जैसे पाठकों के दिल और दिमाग में एक जगह बना ली है। इस सब के बावजूद अगर मुझे सबसे प्रिय कोई कॉलम लगता है तो वह है- आइये सीखिए भारतिय भाषाएं। इसमे एक ही बोलचाल के वाक्य को हिन्दी सहित आठ भाषाओं में लिखा जाता है। हर बार नया विषय और उससे जुड़े 15 वाक्य।एक बार रेलगाड़ी से जुड़े 15 वाक्य थे तो इस बार हवाई जहाज से सम्बन्धित। और ये सभी वाक्य देवनागरी लिपि में लिखे होते हैं।
जैसे कि तेलगु में मैने मथुरा में गाड़ी बदली थी हो जायेगा नेनु मक्षरालो बंडिनी मारानु और कन्नड़ में नानु माथुरादल्लि रलु बदलायिसिदे!
जवाहर कर्नावट को शुरू से ही पत्रकारिता का शौक रहा है।उस जमाने में हिन्दी स्टैनोग्राफी में माहिर हो और पत्रकारिता का शौक होने के कारण वे नई दुनिया आदि अखबारों के लिये फ्रीलांसिंग करते थे। बैंक में स्टेनो की नौकरी मिलने के बाद भी उनका यह शौक बरकार रहा एक नये अंदाज में। उन्होने हिन्दी पत्रकारिता पर पी एच डी कर डाली उनका शोधग्रंथ जल्द ही एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने वाला है।
उनकी एक पुस्तक भी जल्द ही प्रकाशित होने वाली है। यह है विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता के सौ साल। इसके लिए वे कई देशों मे भी गए हैं।

अक्षय्यम के ताजा अंक में विदेशों मे हिन्दी दिवस के आयोजन की रिपोर्ट है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने इस बार पहली बार विदेशों मे हिन्दी दिवस मनाया था। पूरे  25 देशों में।

Tuesday, June 23, 2015

ब्रिटिश लाइब्रेरी

दत्तात्रेय कुलकर्णी
इस रविवार को लाइब्रेरी के आनलाईन रिसोर्सिस के उपयोग पर एक घंटे के कार्यक्रम में भाग लिया। काफी उपयोगी था।
इस लाइब्रेरी के साथ शुरू से ही सम्बन्ध है।35 साल हो गए हैं। अहमदाबाद में शुरू हुई तब से. उस जमाने से जब कर्णिक इसके लाइब्रेरियन हुआ करते थे और आज लाइब्रेरियन के नए स्वरूप मैनेजर के पद पर दत्तात्रेय कुलकर्णी हैं।

जिस प्रकार से कुलकर्णीजी ने विभिन्न संसाधनों के बारे में जानकारी दी और हमारे जैसे पाठकों के छोटे-छोटे कभी कभार फालतू विषय वाले, सवालों के जवाब दिए उससे उनका विषय ज्ञान ही नहीं पर मेम्बर प्रेम भी झलकता है।
लाइब्रेरी की यही खूबी है कि जो आज तक हमें इससे जोड़े हुए हैं। पिछले महिने लायब्रेरी से हुता रावल का फोन आया। योगेशभाई आपने कलकत्ता लायब्रेरी में जिस पुस्तक को रिजर्व करवाया है वह अहमदाबाद में भी उपलब्ध है। क्या आपके लिए अहमदाबाद में इसे रिजर्व कर दूं।
आप भी किसी लाइब्रेरी के सदस्य होंगे। क्या आपने लाइब्रेरी को पाठक के लिए इतना संवेदनशील पाया है? जवाब ना में ही होगा। मेरा खुद का अनुभव यह कहता है. और इस लाइब्रेरी के स्टाफ का यह व्यवहार मुझ पत्रकार तक ही सीमित नहीं है।
मैं गुजरात विद्यापीठ लाइब्रेरी का 1969 से आजीवन सदस्य हूं और लगभग 1980 से एमजे लाइब्रेरी से जुड़ा हुआ हूं। ये दोनों राज्य की सबसे बड़ी लाइब्रेरी हैं। इससे पहले म्यु. कार्पोरेशन के बालभवन में बच्चों की किताबें पढ़ने जाता था।
पर आजकल मेरी प्रिय लाइब्रेरी ब्रिटिश लाइब्रेरी है जिसका मैं महत्तम उपयोग करता हूं। न तो मैं अंग्रेजों का तरफदार हूं, न ही अंग्रेजी का। ब्रिटिश लाइब्रेरी की कई विशेषताएं हैं जिन्होंने इसे मेरे जैसे पाठकों का प्रिय स्थल बना दिया है।
मेरे जीवन में इस लाइब्रेरी से जुड़ी कई ऐसी घटनाएं हैं जो एक लम्बे रोचक लेख का मसाला बन सकती हैं। फिलहाल तो लाइब्रेरी की खासियतों की ही बात करूंगा।
सर्वप्रथम तो यह कि यहां पुस्तकें इस प्रकार से रखी हुई हैं कि कोई भी आसानी से पुस्तक ढूंढ सकता है पास के स्टूल या कुर्सी-टेबल पर बैठ पढ़ सकता है।
इससे विशेष यह है कि अच्छी विदेशी किताबें तो मिलती ही हैं साथ ही लेटेस्ट भी। 2015 में आप 2015 की ताजा किताब पढ़ सकते हैं।
इन सबसे खास यह कि यदि आपको कुछ अच्छा लगे तो जेरोक्स भी करवा सकते हैं! !उतारने की माथापच्ची ही नहीं।
मेरे लिए सबसे बड़ा आकर्षण है इसकि विदड्रोन (पुस्तकालय से बाहर नकाली गई पुस्तके) बुक्स की सेल। हर वर्ष मार्च में कुछ हजार पुरानी पुस्तकें सदस्यों को सस्ते दाम पर बेची जाती है। मेरी लाइब्रेरी में इस प्रकार की दर्जनों पुस्तकें हैं। हर वर्ष मैं काफी पुस्तकें इस सेल में खरीदता हूं।
अगला बड़ा लेख मैं लाइब्रेरी में बैठ कॉफी के साथ लिखूंगा सभी मेम्बरों में एक अन्य चीज जो प्रिय हैं वह है कॉफी। आप लाइब्रेरी में कॉफी के साथ लिख पढ़ सकते हैं, क्या किसी लाइब्रेरी में कॉफी के साथ किताब पढ़ने का लुत्फ उठा सकते हैं?
लिखने को तो और बहुत कुछ है। खैर फिर कभी।
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